हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , ईरानी वार्ता दल के प्रमुख और संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाकिर क़ालिबाफ़ ने कहा है कि ईरान और अमेरिका के बीच हुए समझौते की असली गारंटी संयुक्त राष्ट्र या सुरक्षा परिषद नहीं, बल्कि इस्लामी गणराज्य ईरान की सैन्य शक्ति, रक्षा क्षमता और मिसाइल बल है। उन्होंने साफ कहा कि अगर अमेरिका अपने वादों पर अमल न करे तो ईरान हर तरह की प्रतिक्रिया और जंग के लिए पूरी तरह तैयार है।
विवरण के अनुसार, मोहम्मद बाकिर क़ालिबाफ़ ने टेलीविज़न पर बातचीत में कहा कि इस्लामाबाद में हुआ समझौता डिजिटल रूप से अंतिम रूप दे दिया गया है और पाकिस्तान व कतर इसके गारंटर नहीं, बल्कि सुविधाकर्ता (facilitator) की भूमिका निभा रहे हैं। उन्होंने बताया कि इस समय ईरान समझौते के अनुच्छेद 13 पर अमल के लिए नए मुद्दों पर बातचीत नहीं, बल्कि सिर्फ व्यावहारिक कदमों के संबंध में चर्चा कर रहा है।
उन्होंने कहा कि हालिया जंग भौगोलिक रूप से पूरे ईरान पर फैली हुई थी, जिसमें देश के पूर्व से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक जमीनी, हवाई, समुद्री और आंतरिक सुरक्षा मोर्चों पर पूर्ण युद्ध लड़ा गया, जबकि लेबनान, इराक और यमन सहित प्रतिरोधी मोर्चा भी इस संघर्ष का हिस्सा था।
क़ालिबाफ़ ने कहा कि युद्ध की समाप्ति और युद्धविराम के बाद समझौते पर अमल के दौरान कुछ कठिनाइयाँ और तनाव स्वाभाविक हैं, खासकर इज़राइल की ओर से। समझौते की पहली शर्त में अमेरिका ने इस बात की गारंटी दी है कि लेबनान में युद्ध समाप्त होगा, सभी सैन्य कार्रवाइयाँ रुकेंगी, विस्थापित लोग अपने घरों को लौटेंगे और लेबनान की संप्रभुता बहाल होगी।
उन्होंने कहा कि कुछ तत्व जलडमरूमध्य हुर्मुज़ में समझौते का उल्लंघन करते हुए ऐसे कदम उठाना चाहते हैं जो समझौते की शर्तों के विपरीत हैं, हालांकि ईरान इस समझौते पर अमल के लिए अपनी जिम्मेदारी पूरी करेगा और अगर किसी भी तरफ से उल्लंघन हुआ तो ईरान उचित प्रतिक्रिया देगा।
ईरानी वार्ता दल के प्रमुख ने स्पष्ट किया कि ईरान इस समय समझौते पर अमल के लिए बातचीत कर रहा है, लेकिन अगर दूसरा पक्ष अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी न करे तो ईरान जंग के लिए भी पूरी तरह तैयार है और आवश्यक कदम उठाने से पीछे नहीं हटेगा।
उन्होंने कहा कि लेबनान की स्थिति दूसरे मामलों से अलग है क्योंकि इज़राइल अब भी दक्षिणी लेबनान के कुछ इलाकों पर कब्ज़ा किए हुए है, हालांकि समझौते के बाद सैन्य झड़पों में काफी कमी आई है।
क़ालिबाफ़ के अनुसार, ईरान राजनयिक और सैन्य दोनों मोर्चों पर समझौते की पाँच मूल शर्तों पर अमल की लगातार निगरानी कर रहा है ताकि निर्धारित अवधि के भीतर सभी वादे पूरे किए जा सकें।
उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि ईरान की रक्षा ताकत, मैदान में उसकी बढ़त और मिसाइल क्षमता किसी भी सूरत में वार्ता का हिस्सा नहीं हैं और यही ताकत समझौते के क्रियान्वयन की वास्तविक गारंटी है।
उन्होंने बताया कि ज़्यूरिख़ में अमेरिका, पाकिस्तान और कतर की उपस्थिति में हुई चार-पक्षीय बैठक में केवल समझौते के प्रारंभिक चरण पर अमल के तरीक़े पर चर्चा हुई, क्योंकि मूल वार्ता समझौते पर हस्ताक्षर होने के साथ ही पूरी हो चुकी है।
क़ालिबाफ़ ने आगे कहा कि इज़राइल ने समझौते पर हस्ताक्षर होने के तुरंत बाद उसे विफल करने के लिए हमले तेज़ कर दिए, क्योंकि यह समझौता वास्तव में अमेरिका और इज़राइल की विफलता का दस्तावेज़ है। इसी कारण ईरान ने निर्धारित समय से पहले स्विट्ज़रलैंड जाकर समझौते पर अमल के संबंध में तत्काल परामर्श किया।
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